ज्ञान की अनन्त रश्मियों का सूर्य जब अपने दिव्य स्यन्दन पर सवार होकर अखिल ब्रह्माण्ड का चक्रमण करता है, तब अनेक नवोढ़ा श्रुतियाँ उसका अनुगमन करती हैं। ज्ञान की यह परम्परा ‘श्रुति' के सोपान से प्रारम्भ होती है। श्रुति से प्रारम्भ हुआ एक मार्ग वेद की गुरु गम्भीर किन्तु सुदर्शना उपत्यकाओं की ओर जाता है, तो दूसरा मार्ग संगीत की रसवन्ती सरिताओं के बीच आनन्द का अनुसन्धान करता है। ज्ञान के इस मार्ग का निर्माण भारतीय ऋषियों ने अपनी निष्ठा, साधना और तपस्या के बल पर किया है।शताब्दियों तक नवोढ़ा श्रुतियों की असंख्य शिविकाओं का दायित्व गुरु-शिष्य-परम्परा के सुदृढ़ स्कन्धों पर टिका रहा। श्रुतियों के गर्भ से उत्पन्न हुईं अगणित ऋचाएँ अपने अकुण्ठ सौन्दर्य से वाङ्मय के विशाल प्रांगण का श्रृंगार करने लगीं। ज्ञान-कुञ्ज की नयी नवेली ऋचाओं का परिणय वेद के मण्डलों के साथ हुआ। शनैः शनैः वयोवृद्ध ज्ञान का परिवार बृहत्तर होता गया। श्रुतियों के वंश का विस्तार वेद, उपनिषद्, आरण्यक, ब्राह्मण आदि के पंक्तिपावन कुलों में विभक्त होता गया। ज्ञान के इन औरस पुत्रों ने पुराणों की सर्वगुणसम्भवा षोडशी कथांगनाओं से ब्याह रचाया। इसी बीच ‘लिपि' का जन्म हुआ। ऋषियों ने जब अपने पुनीत पाण्डु से लिपि को दुलराया, तब ‘पाण्डुलिपि का प्राकट्य हुआ। इस प्रकार वाङ्मय के संस्कृति और संस्कारसम्पन्न परिवार के सुरक्षित बसेरे की आवश्यकता प्रतीत होने लगी। हिमालय के सुरम्य परिसर में बसे भोजवृक्षों ने जब अपने वल्कल से पण्डुलिपि का षोडशोपचार श्रृंगार किया, तब जाकर धरती पर तपस्विनी सती के समान सुशीला पुस्तकांगना का अवतरण हुआ। पुस्तक का धरत्री के अंक में धीरे धरे पग बढ़ाना कोई सामान्य घटना नहीं थी। अब वल्कलसंवीता पुस्तक के आ जाने से वाङ्मय का राजप्रासाद और भी मनोहर हो गया था। बतरस के आनन्द में अहर्निश डूबी सरस्वती को अब पुस्तक के रूप में प्रिय सखी मिल गयी थी। सरस्वती। पुस्तकप्रिया हो गयी थीं।